Selfish friend friendship

Moral Stories in Hindi | स्वार्थी मित्र से मित्रता

स्वार्थी मित्र से मित्रता

इस post में हम आपको Moral stories in Hindi के बारे में बताने वाले है। इन stories को आपने बचपन में अपने दादा दादी से सुना होगा। ये कहानियाँ बहुत ही ज्ञानवर्धक और शिक्षावर्धक है। इन नैतिक कहानियों से आप बहुत सारी अच्छी बात सीखेंगे। जिनको आप अपनी life में प्रयोग करके सफलता पा सकते है। ये कहानियाँ बहुत ही रोचक है। जिनको पढ़कर आपको बहुत आनंद आएगा। इनमे कुछ latest moral short stories in Hindi 2021 दी गयी है। यदि आप old stories पढ़ कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको सबसे अच्छी latest 100 Moral stories in Hindi for kids दे रहे है।

नैतिक कहानियां – स्वार्थी मित्र से मित्रता 

(स्वार्थी व्यक्ति कभी किसी का नहीं होता | ऐसे लोगों से मित्रता भी प्राणघातक है)

किसी एक जंगल में एक बहुत पुराना कुंआ था । जिसमें कुछ पानी भी था । उस कुए के पानी में कुछ मेंढक रहते थे । लेकिन उन मेंढकों का एक मुखिया (सरदार) भी था । उस कुएं में रहने वाले सभी मेंढक उसका कहना मानते थे । कभी कभी आपस में वे मेंढक किसी की प्रशंसा या बुराई आदि भी करते रहते थे यानि बडी हंसी खुशी से मिल जुलकर रहते थे ।

मेढकों का मुखिया कुछ दिनों बाद मर गया था । लेकिन उस मुखिया (मेंढक) ने अपने उत्तराधिकारी यानि नये मुखिया का चुनाव अपने सामने ही करा दिया था ,परन्तु उस नये मुखिया (नेता ) ने किसी कारणवश मेंढकों के समूह की कमान संभाल ली थी । लेकिन लगभग तीन चार माह के बाद ही उस कुए में रहने वाले कुछ मेंढको का उस नये मुखिया से विरोध शुरु हो गया था ।

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इस प्रकार उस कुए में रहने वाले मेंढको में अब दो गुट यानि दल बनने लगे थे । धीरे धीरे उनमें आपसी संघर्ष यानि झगडें भी होने लगे । तभी उनमें से एक युवा मेंढक जो बहुत ही स्वार्थी व मक्कार था उस युवा मेंढक ने , उस कुएं से दूर जाकर रहने का तय कर लिया । एक दिन अवसर देखकर वह युवा मेंढक उस कुएं से बाहर निकल ही आया । कुएं की दीवार पर बैठकर उसने कुछ सोच विचार भी किया । उसे वहां अच्छा भी लगा । उसने सोचा क्यों ना मैं अपने इस मुखिया मेंढक को मारकर अपने अपमान का बदला  ले लूंँ ।

Selfish friend friendship स्वार्थी मित्र से मित्रता
Selfish friend friendship स्वार्थी मित्र से मित्रता

उसने यह सब-कुछ बार बार सोचा विचारा । विचार करते करते उसने निश्चय किया कि क्यों ना मैं अपने शत्रु पक्ष के मेंढकों को मरवा दूं– तो कैसा रहेगा ? अब वह युवा मेंढक रोजाना कुएं से बाहर आता तथा इसी प्रकार की उल्टी सीधी योजनाएं बनाता था ।

Selfish friend friendship – Moral Story

एक दिन उस युवा मेंढक ने उस कुएं के पास ही स्थित एक बडे से तालाब को भी देखा । उस तालाब में बहुत पानी था , व बहुत सारी-छोटी -बडी मछलियों को तैरते हुए देखा । उसे बहुत अच्छा लगा । वह मेढक भी उसी तालाब में रहता व मछलियों से घुल मिल भी गया था । फिर
एक दिन उस युवा मेंढक ने तालाब की उन मछलियों से मित्रता भी करनी शुरु कर दी । अब वह यदा कदा समय निकालकर तालाब की उन मछलियों से बातें भी करता था । अपना सुख दुख भी बांट लेता था ।

तभी उस मेंढक ने देखा की उस तालाब के पास में एक बडा सा पेड है , उसकी जड में एक सांप भी बिल बनाकर रहता है और वह सांप रोजाना एक दो मछली को पकड कर ले जाता तथा अपने बिल में मारकर खा कर अपना जीवन यापन करता था। तभी उस युवा मेंढक ने उस सांप से भी मित्रता करने का निश्यच कर लिया था ।

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इस कारण वह युवा मेढक सोचने लगा की क्यों ना मैं इस विषेले सांप से मित्रता करके अपने शत्रु मेंढको को भी इसी सांप से मरवा दूंँ । इस प्रकार वह युवा मेंढक साँप के पास जाकर बैठता तथा बातें करता था । फिर बातों ही बातों में इस सांप को एक दिन अपने ही घर में यानि इस कुए में ही रहने का आमंत्रण दे दूंगा । इस प्रकार यह सांप मेरा तो मित्र बन ही जाएगा और फिर मेरी मित्रता के कारण मेरी बात भी मानेगा , फिर रात में अवसर देखकर मेरे शत्रु मेंढको को धीरे धीरे समाप्त कर देगा ।

किसी को इसका पता भी नहीँ चलेगा । फिर एक दिन मैं यहांँ इस कुएं में रहने वाले इन सभी मेंढकों का सरदार यानि मुखिया बन ही जाऊँगा । अब मुझे अपना यह सब काम बडी सावधानी से करना पडेगा । कुछ दिन बाद उस युवा मेंढक ने सांप को कुछ मछलियां भी खाने को ले जाकर दीं ।

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फिर बातों ही बातों में मेंढक ने उस सांप से अपनी मित्रता करने की बात भी कह दिया तथा बदले में उसने उस सांप को रोजाना मछलियां लाकर देने व खिलाने का बचन भी दे दिया था । अब वह युवा मेंढक रोजाना उस सांप को तालाब से तीन- तीन या चार -चार मछलियां ले जाकर देता था । अब तो उस सांप को आसानी से घर बैठे ही खाना मिलने लगा था ।

लेकिन कुछ समय बाद ग्रीष्म ऋतु आने पर उस तालाब का पानी भी सूखने लगा , तथा तालाब की मछलियां भी कम होने लगीं थी । एक दिन उस तालाब की मछलियां भी पानी के अभाव में मर गयीं । तब एक दिन उस सांप ने अपने मित्र युवा मेंढक से कहा की अब फिर से मेरे लिए कुछ भोजन की व्यवस्था करो । तब उस युवा मेंढक ने कहा कि तुम तो मेरे प्रिय मित्र हो ।

Selfish friend friendship – Moral Story In Hindi

अब तुम मेरे साथ मेरे घर में चलकर ही रहना । क्योंकि एक मित्र की रक्षा करना व उसकी सहायता करना ही एक सच्चे मित्र का धर्म व कर्तव्य होता है ।इस प्रकार वह युवा मेंढक अगले ही दिन अपने ही घर में यानि उस कुएं में ले आया । लेकिन सांप और मेंढकों की तो हमेशा से शत्रुता रही है । अतः उस कुएं में उस मेंढक को आया हुआ देखकर अन्य सभी मेंढक भयभीत रहने लगे थे । सभी ने उस मूर्ख युवा मेंढक के द्वारा बुलाए गये सांप के लाने का विरोध भी किया था । उसके इस कार्य की निन्दा भी की थी ।

परिणाम स्वरूप अब उस कुएं में रहने वाले अन्य सभी मेंढक शान्त व भयभीत से रहने लगे थे । अब उस युवा स्वार्थी मेंढक ने सांप का परिचय अपने परिजनों व अपने पक्ष के लोगों से कराया तथा उनको ना खाने लिए कहा सांप ने अपने मित्र मेंढक की इस शर्त को उस समय मान भी लिया था ।

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अब वह सांप अपने मित्र मेंढक के सहयोग से शत्रुपक्ष वाले मेंढकों व उनके छोटे बच्चों को भी खा लेता था । धीरे धीरे उस कुएं में रहने वाले शत्रुपक्ष के सभी मेंढक समाप्त हो गये , कुछ समय बाद उन मेंढकों का (वह शत्रुपक्ष)सरदार भी मार दिया गया । लेकिन उस सांप ने फिर अपने मित्र मेंढक से का अब फिर से मेरे लिए कुछ भोजन आदि की व्यवस्था कर दो , नहीं तो तुम्हारे ही इन परिजनों को छोडकर , तुम्हारे मित्र पक्ष के मेंढकों को खाऊंगा ।

इस प्रकार उस सांप ने तो उस मूर्ख व मक्कार तथा अपने स्वार्थ में अन्धे हुए युवा मेंढक के मित्रपक्ष वाले मेंढकों को भी नहीँ छोडा । इस प्रकार एक दिन उसके परिजन भी , उसके बच्चे भी ,सांप का निवाला यानि आहार बन गये और अन्त में वह युवा मेंढक और उसका वह प्रिय मित्र रुपी सांप ही उस कुए में रह गये ।

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अब उस युवा मेंढक को अपनी छोटी तथा जीवन की सबसे बडी व भयंकर भूल का आभास हुआ कि अब तो उसका स्वयं का जीवन (प्राण) भी संकट में हैं । उस युवा मेंढक ने भी यह जान लिया था कि जिसने देखते ही देखते , मित्र बनकर भी अपने मित्र के सभी परिजनों व बच्चों तक को भी नहीँ बख्शा , जिसने अपने आश्रय दाता को कैसे छोड देगा ? कुछ दिन बाद फिर उस सांप ने अपने मित्र मेंढक से फिर कहा मित्र मैं भूखा हूंँ मेरे लिए खाने की व्यवस्था करो नहीं तो मैं तुमको ही खाकर अपनी भूख समाप्त करुंगा ।

लेकिन अब युवा मेंढक पर तीन ही उपाय थे कि पहला यही वह मेंढक स्वयं को भी उस मित्र सांप के सामने भोजन बनकर मर जाये, या स्वयं के जीवन की रक्षा के लिए उस सांप से संघर्ष करके सांप को मार दे या मर जाए , और तीसरा था कि अपनी जीवन रक्षा हेतु वह उस सांप को (ऐसे मित्र को ) छोडकर भाग जाए ।

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लेकिन जो लोग दूसरों के छल बल या सहयोग से अपने ही परिजनों या स्वजनों को मरवा देते हैं , वे स्वयं ही सबसे बडे कायर व डरपोक होते हैं ,उनमें शत्रु से सामना करने , या युद्ध करने का साहस ही नहीं होता है । इस कारण वह कायर प्रवृत्ति वाला , निकृष्टतम, कुलकलंकित युवा मेंढक अपनी जीवन रक्षा के उद्देश्य से ही उस सांप से यही कहकर गया मित्र रुको मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने का सामान और लेकर आता हूं । फिर उस कुएं की दीवार के ऊपरी सतह पर बैठकर उस मेंढक से कहा अब मैं इस कुएं वापस नहीँ आऊंगा । मुझे अब अपनी छोटी सी परन्तु बहुत ही बडी भूल का आभास , अपने सभी स्वजनों को नष्ट कराने के बाद हुआ है । मैं अब इस कुएं अब वापस नहीँ आ सकता ।

इस कारण हमें अपने हर एक छोटे से छोटा कार्य व्यक्ति गत स्वार्थवश नहीं करना चाहिए । इस कारण हमें दूसरों से मित्रता करते समय परिवार तथा स्वजनों के मान सम्मान का भी ध्यान रखना चाहिए ।

Conclusion of Moral Story

इसी संदर्भ में रहीमदास जी ने भी सही कहा है —
टूटे सुजन मनाईए ,
ज्यों टूटें सो बार ।
रहिमन फिर फिर पोइए ,
ज्यों टूटे मुक्ताहार।।
भावार्थ —यहांँ सुजन शब्द का अर्थ है (स्वजन , यानि परिजन या अपने मित्र सगे सबंधी लोगों से ) तथा सुजन या सज्जन लोग (यानिअच्छे लोग) तथा इसी प्रकार टूटे शब्द का अर्थ है टूटना ,व नाराज होना ।

मुक्ताहार मोतियों की माला । अर्थात रहीमदास ने कहा है कि हमें कभी अपने परिजन लोगों , व सज्जन लोगों व विद्वान लोगों , अपने मित्रगणों आदि को ऐसा नाराज नहीं करना चाहिए को हम से अलग ही हो जाएँ या या हमसे बातचीत बन्द करदें । ऐसे लोगों को या इन सभी को बार-बार मना लेना चाहिए । क्योंकि जैसे मोतियों से बनी माला बार – बार टूट जाने पर भी जोड ली जाती है तो ठीक उसी प्रकार हमें भी तो अपने स्वजनों तथा सज्जन लोगों या अपने से बडों को , बार खुश ( प्रसन्न )कर लेना चाहिए ।

Author: Shayari_Love

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