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Moral Stories in Hindi | कपिला गाय की सत्य निष्ठा 

Moral Stories in Hindi | कपिला गाय की सत्य निष्ठा

इस post में हम आपको Moral stories in Hindi के बारे में बताने वाले है। इन stories को आपने बचपन में अपने दादा दादी से सुना होगा। ये कहानियाँ बहुत ही ज्ञानवर्धक और शिक्षावर्धक है। इन नैतिक कहानियों से आप बहुत सारी अच्छी बात सीखेंगे। जिनको आप अपनी life में प्रयोग करके सफलता पा सकते है। ये कहानियाँ बहुत ही रोचक है। जिनको पढ़कर आपको बहुत आनंद आएगा। इनमे कुछ latest short moral stories in Hindi 2021 दी गयी है। यदि आप old stories पढ़ कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको सबसे अच्छी latest 100 Moral stories in Hindi for kids दे रहे है।

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यह कथा कपिला नामक गाय का वर्णन महर्षि वेदव्यास जी द्वारा लिखित स्कन्द पुराण पर आधारित है 】 जो हम सभी को सत्य बचन का पालन करने यानि हमारे द्वारा यदि किसी कोई वादा या बचन बध्दता की जाए तो उसे जरुर पूरा करना चाहिए । जैसे महाराज हरिश्चंद्र तथा राजा दशरथ , आदि ने अपनी सत्य निष्ठा बनाए रखी थी ।

kapila gaay kee saty nishthabest moral story  【 yah katha kapila naamak gaay ka varnan maharshi vedavyaas jee dvaara likhit skand puraan par aadhaarit hai 】 jo ham sabhee ko saty bachan ka paalan karane yaani hamaare dvaara yadi kisee koee vaada ya bachan badhdata kee jae to use jarur poora karana chaahie . jaise mahaaraaj harishchandr tatha raaja dasharath , aadi ne apanee saty nishtha banae rakhee thee .

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एक बार कपिला नामकी यह गाय अपने आश्रम की गायों के झुंड के साथ जंगल में चरने गयी थी , लेकिन सुन्दर व कोमल और स्वादिष्ट घास को खाते खाते वह दूर निकलकर चले जाने के कारण अपने समूह यानि उस झुंड से बिछुड़ गयी थी । रोजाना की तरह आश्रम की सभी गाएं एक निश्चित समय पर एक जगह पर एकत्र होकर शामको अपने आश्रम में वापस आगयीं थीं ।परन्तु कपिला गाय तो भूख व स्वादिष्ट घास ,व कोमल तथा अतिप्रिय घास चरते-चरते दूर किसी घने जंगल में जाकर अपना रास्ता भटक गयी ,तथा अपने आश्रम नहीं आ सकी थी ।

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ऊधर आश्रम की गायों के समूह से बिछुडकर तथा उस घने व अज्ञात जंगल के कारण उस कपिला गाय को अपने अबोध व छोटे से बच्चे (शिशु गौ शावक) का ध्यान हो रहा था । वह कपिला गाय मन ही मन में घबरा रही थी कि मेरा शिशु अभी बहुत छोटा है ,ठीक खडा भी नहीं हो पाता , मेरे द्वारा आश्रम ना पहुँचने पर उसको दुग्धपान कौन कराएगा ? वह बेचारा बार बार मेरे द्वारा वापस आने की इधर की ओर ही मुख करके प्रतिक्षा कर रहा होगा । वह अधीर होकर तथा मेरे से अधिक प्रेम होने पर मुझे मांँ मांँ ऐसा कहकर रो रहा होगा ।

यह सब सोचते हुए वह कपिला गाय स्वयं को मन ही मन में बुरा भला कहने लगी तथा किसी तरह से आश्रम की ओर वापस आने के लिए उस भंयकर जंगल के अज्ञात रास्ते से दौडते हुए वापस आने लगी थी । लेकिन तभी उस कपिला गाय ने अपने सामने कुछ ही दूरी पर स्थित एक भंयकर सिंह को भी देखा । जो उस गाय पर झपटने लिए घात लगाए बैठा था ।

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उस विकराल मुख वाले तथा जिसके दांत नुकीले तथा जबडा भी मजबूत था , को सामने आया हुआ जानकर व मृत्यु भय के कारण उस कपिला गाय ने मन ही मन में अपने बच्चे के करुणा भरे बाल स्वरुप को याद करते हुए ,अपनी आँखे बन्द करके रोने लगी ।

तब उस सिंह ने उस कपिला गाय से उसके रोने का कारण पूछा । तब उस कपिला गायने अपने मन की करुण वेदना तथा अपने अबोध व छोटे से बच्चे यानि उस बछड़े के प्रति अपने ममता भरे भाव को बताते हुए कहा । कि हे मृगराज यह तो ठीक है कि तुम बहुत भूखे हो , मुझे खाकर तुम अपनी भूख भी मिटाना चाहते हो , मैं इसके लिए तैयार हूं । लेकिन क्या तुम मेरे उस अबोध बच्चे जो अभी बहुत छोटा है , जिसका जन्म कुछ ही दिन पहले हुआ है , जो ठीक से खडा भी नही हो पाता है, जिसने अभी पूंछ उठाकर, दौडना भी नहीं जाना है , ऐसा अबोध मेरा शिशु मेरे द्वारा दुग्धपान ना कराए जाने के कारण ,भूखा ही मर जाएगा , हे सिंह श्रेष्ठ मेरे इस रोने का कारण आपके द्वारा मारे जाने का भय नहीँ है ,

मेरे इस रोने का वास्तविक कारण मेरे उस अबोध बछडे (शिशु शावक) की निरीहता ममता ही । इसमे उसका क्या दोष या अपराध है ? तब उस सिंहं नेअपनी भाषा में कपिला गाय से कहा । कि हे धेनु तुम जानती हो अब तुम मेरा भोजन हो , अपने सामने प्रस्तुत (तैयार ) भोजन को ठुकराना या छोडना भी ठीक नहीँ है ? अब तो तुमको खा लेना ही मेरा धर्म है ।

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लेकिन उस कपिला गाय ने अपने उस अबोध शिशु की ममता के साक्षी मानकर, उस सिंह से कहा कि हे सिंहराज — यदि तुम मुझे इस समय यहांँ से अपने बाडे में (आश्रम) जाने दोगे, तो मैं कपिला गाय तुमको विश्वास दिलाती हूँ कि – मैं अपने उस अबोध शिशु शावक को दुग्धपान कराकर , उसे अन्तिम स्नेह दुलारे करते हुऐ शीध्र ही वापस तुम्हारे पास भोजन धर्म का पालन करने आ जाऊंगी । सिंह ने भी उस कपिला गाय की इस आपत्ति काल में जब प्राणों के भय से बच्चे के प्रति अटूट प्रेमभाव के कारण और सत्यनिष्ठा पालन के दृढ संकल्प को जानकर सिंह ने कपिला गाय को उस समय आश्रम के लिए भेज दिया था ।

उस आश्रम में कपिला गाय को वापस आया देखकर सभी गाएं तथा उसका शिशु शावक मांँ मांँ कहते हुए , कपिला गाय से दुलार करने लगा , कपिला गाय ने भी अपने उस अबोध शिशु (बछडे) खुब दुग्धपान कराया तथा बहुत स्नेह दुलार भी किया था । शायद यहीँ मानकर कि मेरा यही स्नेह दुलार अब इस अबोध (बछडे ) को नहीँ मिल पाएगा ? यह सब कुछ सोचते हुए वह कपिला गाय अपनी सत्य निष्ठा को सर्वोपरी तथा किसी को (शत्रु को भी )दिए गये बचन पालन के लिए ही वापस उसी सिंह के सामने प्रस्तुत हो गयी थी ।

परन्तु प्राणसंकट होने पर भी , दिये गये बचनो या स्वयं के द्वारा कहे बचनों का पालन करने के लिए ही यह गाय अपनी सत्यनिष्ठा के पालन हेतु मेरे सामने स्वयं आजाएगी । यह मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा है ?

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इस प्रकार एक ओर तो अपने शिशु शावक के लिए अटूट स्नेह तथा दूसरी ओर अपने द्वारा दिए गये बचन (बात )की पूर्ति हेतु यह कपिला गाय विश्व में अद्भुत है । अन्त में वह सिंह उस कपिला गाय से कहता है हे सुर धेनु आप धन्य व पूजनीय हो , मैं आपकी सत्य निष्ठा देखकर अति प्रसन्न हूँ । मैं तुमको अभय दान देता हूं । क्योंकि जो सत्यनिष्ठा पर अडिग रहते हैं तो शत्रु भी यानि (स्वयं काल भी )या यमराज भी उनका कोई अहित नहीँ कर सकता है । इस प्रकार वह कपिला गाय, सिंह की अनुमति से गदगद व खुशी के तेजी से दौडते हुए पुनः आश्रम आकर अपने शिशु के साथ रहने लगी थी ।

Author: Shayari_Love

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